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ब्रह्मी (Brahmi) के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण

ब्राह्मी (Brahmi) के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण

ब्रह्मी के पेड़ अधिकतर गंगा नदी के किनारे पाये जाते हैं. ब्रह्मी का पेड़ छत्ते के समान जमीन पर फैला हुआ होता है. ब्राह्मी की एक और प्रजाति होती है. जिसको मंडक पर्णी कहा जाता है. इसकी बेल भी पृथ्वी पर फैलती है. ब्रह्मी के पत्ते छोटे होते हैं. हमारे देश में अधिकतर यही पायी जाती है.
तो Brahmi जैसी शक्तिवर्धक औषधि का प्रयोग-प्रचलन न होने का ही परिणाम है. बल तीन प्रकार के होते है- शरीर बल, मनोबल और आत्मबल. तो Brahmi के सेवन से तीनों ही बल बढतें तथा समग्र स्वास्थ्य संवध्र्न की आधरशिला रखते है. वनस्पति शास्त्र की दृष्टि से ब्रह्मी को हरपेस्टिंस मनेनिएरा अथवा बकायो मोनि ऐरा के नाम से जाना जाता है. इसकी उत्पत्ति मुख्य रूप से नमी वाले क्षेत्राों में होती है. जलासन्न स्थानों पर पाई जाने के कारण इसे जलनिम्ब भी कह कर पुकारते है.

ब्रह्मी के विभिन्न भाषाओं में नाम :

• हिंदी ब्रह्मी
• अंग्रेजी बकोपा मोनिएरा
• मराठी Brahmi
• गुजराती Brahmi
• बंगाली ब्राह्मी, शाक, थुलकुडी
• फारसी जर्णव
• लैटिन सेण्टाला एश्सियाटिका
• अंग्रेजी इण्डियन पेनीवर्ट
• संस्कृत पोतवंका, सोमवल्ली, महौषधि, दिव्या, सरस्वती, मण्डूकपर्णी, मण्डूकी, शारदा,कपोतबंकारंग : ब्राह्मी हरे और सफेद रंग का होता है.

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स्वाद : यह खाने में फीका होता है.

Brahmi का पौधा हिमालय की तराई में हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग में अधिक मात्रा में पाया जाता है. जो बहुत उत्तम किस्म का होता है. ब्राह्मी पौधे का तना जमीन पर फैलता जाता है. जिसकी गांठों से जड़, पत्तियां, फूल और बाद में फल भी लगते हैं. इसकी पत्तियां स्वाद में कड़वी और काले चिन्हों से मिली हुई होती है. ब्राह्मी के फूल छोटे, सफेद, नीले और गुलाबी रंग के होते हैं.

ब्राह्मी के फलों का आकार गोल लम्बाई लिए हुए तथा आगे से नुकीलेदार होता है जिसमें से पीले और छोटे बीज निकलते हैं. ब्राह्मी की जड़ें छोटी और धागे की तरह पतली होती है. इसमें गर्मी के मौसम में फूल लगते हैं. जहां नदी, नाले और नहरों की बहुलता होगी, वहां इसे अध्कि मात्रा में उपलब्ध् किया जा सकता है. जडी-बूटी की पहचान न होने के कारण लोग कभी-कभी मण्डूकपर्णी को भी ब्राह्मी समझ बैठते है. जबकि उसके गुण र्ध्म बिल्कुल पृथक है. इसकी पत्तियाँ एक इंच अथवा इंच के चौथाई भाग तक चौडी गोलाकार होती है. फलों का रंग नीला अथवा हल्का गुलाबी होता है. पफलों की आकृति गोल और अग्रभाग नुकीला रहता है. गर्मी के दिनों में फल और बाद में पफलित होती है. औषध्यि दृष्टि से पूरा पंचाग ;जड, तना, पत्ती, फल और पफलद्ध ही प्रयुक्त होता है.

Brahmi के पत्ते पतले, पुष्प सफेद अथवा नीले और स्वाद में कडवापन होता है. जबकि मण्डूकपर्णी के फूल लाल तीखा स्वाद होता है और सूखने के बाद उसकी औषधीय विशेषताएँ प्रायः नष्ट हो जाती है. ब्राह्मी को सुखाकर भी पाउडर के रूप में उतना ही उपयोगी माना जाता रहा है. एक वर्ष की अवधि तक इसका पूर्ण प्रयोग किया जा सकता है.

महर्षि चक ने Brahmi को मानसिक दुर्बलता के कारण उत्पन्न रोगों की रामबाण औषधि घोषित किया है. मनोबल की कमी से ही तो मिरगी रोग की उत्पत्ति होती है. सुश्रुत संहिता में भी कुछ इसी तरह के तथ्यों का उल्लेख है. मानसिक विकृति के कारण ही तो नाडी दौर्बल्य, उन्माद, अप्रसार एवं स्मरण शक्ति के लोप होने लगता है. इसलिए तो ब्राह्मी को एक प्रकार का नर्वटॉनिक भी माना गया है. Brahmi के सूखे चूर्ण को मानसिक तनाव और घबराहट मिटती और अवसाद की प्रवृत्ति समाप्त होती है.

इसके सेवन से शरीर की शक्ति का क्षरण तो रूकता ही है पर मस्तिष्क की क्षमता में अप्रत्याशित अभिवृद्वि होने लगती है. Brahmi के घटक स्नायुकोषों का परिपोषण तो करते ही है साथ ही स्फूर्ति प्रदान करने का प्रयोग भी पूरा होता है. विद्युतीय स्फरणा से स्नायु कोषों की उत्तेजना कम होती और मिर्गी रोग स्वतः ही भागने लगता है.बोलने में हकलाने और अध्कि बोलने से स्वर भंग होने में ब्राह्मी का सेवन ही लाभकारी सिद्ध होता है.

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ब्राह्मी क्वाथ को पिलाने के पीछे एक ही उद्देश्य रहा कि आत्मबल अर्थात ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति होती है . हमारी दृष्टि में Brahmi का एक रासायनिक घटक हर्सेपोनिन सीधे पीनियल ग्रन्धि को प्रभावित करके सिरॉटानिन नामक स्नायु रसायन का उत्सर्जन करता है जो साध्ना की सपफलता का रहस्य भी यही है और आत्म बल सम्पन्न सपफल जीवन जीने की रीति-नीति भी. स्मृति, मेध और प्रतिभा के प्रमापन के लिए प्रयोगशाला भी बनाई थी जिसमें साध्ना काल में अनेकानेक तरह के उत्साहवर्धक परिणाम भी मिले.
ब्राह्मी की ताजा अवस्था का प्रयोग तो सर्वोत्तम है. कहीं उपलब्ध नहीं हो तो सुखाकर पाउडर के स्वरूप में भी प्रयोग किया जा सकता है. कई लोगों को रात्रि को नींद ही नहीं आती और जीवनभर अनिद्रा रोग से पीडत बने रहते है.

मात्रा : 1 से 3 चम्मच ब्राह्मी के पत्तों का रस, ताजी हरी पत्तियां 10 तक सुखाया हुआ बारीक चूर्ण 1 से 2 ग्राम तक, पंचांग (फूल, फल,तना, जड़ और पत्ती) चूर्ण 3 से 5 ग्राम तक और जड़ के चूर्ण का सेवन आधे से 2 ग्राम तक करना चाहिए.

ब्राह्मी के आयुर्वेदिक और औषधीय उपचार :

1 मिर्गी (अपस्मार) होने पर :-

14 से 28 मिलीलीटर ब्राह्मी की जड़ का रस या 3 से 6ग्राम चूर्ण को दिन में 3 बार 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ लेने से मिर्गी का रोग ठीक हो जाता है.

2 धातु क्षय (वीर्य का नष्ट होना) :-

15 ब्राह्मी के पत्तों को दिन में 3 बार सेवन करने से वीर्य के रोग का नष्ट होना कम हो जाता है.

3 आंखों की बीमारी में :-

3 से 6 ग्राम ब्राह्मी के पत्तों को घी में भूनकर सेंधानमक के साथ दिन में 3 बार लेने से आंखों के रोग में लाभ होता है.

4 आंखों का कमजोर होना :-

3 से 6 ग्राम ब्राह्मी के पत्तों का चूर्ण भोजन के साथ लेने से आंखों की कमजोरी दूर हो जाती है.

5 स्मरण शक्ति वर्द्धक : –

10 मिलीलीटर सूखी ब्राह्मी का रस, 1 बादाम की गिरी, 3 ग्राम कालीमिर्च को पानी से पीसकर 3-3 ग्राम की टिकिया बना लें. इस टिकिया को रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ रोगी को देने से दिमाग को ताकत मिलती है.

3 ग्राम ब्राह्मी, 3 ग्राम शंखपुष्पी, 6 ग्राम बादाम गिरी, 3 ग्राम छोटी इलायची के बीज को पीसकर चूर्ण बना लें. इस चूर्ण को थोड़े-सेपानी में पीसकर, छानकर मिश्री मिलाकर पीने से खांसी, पित्त बुखार और पुराने पागलपन में लाभ मिलता है.

ब्राह्मी के ताजे रस और बराबर घी को मिलाकर शुद्ध घी में 5 ग्राम की खुराक में सेवन करने से दिमाग को ताकत प्रदान होती है.”

6 नींद को कम करने के लिए :-

ब्राह्मी के 3 ग्राम चूर्ण को गाय के आधा किलो कच्चे दूध में घोंटकर छान लें. इसे 1 सप्ताह तक सेवन करने से लाभ पहुंचता है.

5-10 मिलीलीटर ताजी ब्राह्मी के रस को 100-150 ग्राम कच्चे दूध में मिलाकर पीने से लाभ होता है.”

7 पागलपन (उन्माद) में :-

6 मिलीलीटर ब्राह्मी का रस, 2 ग्राम कूठ का चूर्ण और 6 ग्राम शहद को मिलाकर दिन में 3 बार पीने से पुराना उन्माद कम हो जाता है. 3 ग्राम ब्राह्मी, 2 पीस कालीमिर्च, 3 ग्राम बादाम की गिरी, 3-3 ग्राम मगज के बीज तथा सफेद मिश्री को 25 गाम पानी में घोंटकर छान लें, इसे सुबह और शाम रोगी को पिलाने से पागलपन दूर हो जाता है.

3 ग्राम ब्राह्मी के थोड़े से दाने कालीमिर्च के पानी के साथ पीसकर छान लें. इसे दिन में3 से 4 बार पिलाने से भूलने की बीमारी से छुटकारा मिलता है.

ब्राह्मी के रस में कूठ के चूर्ण और शहद को मिलाकर चाटने से पागलपन का रोग ठीक हो जाता है.

ब्राह्मी की पत्तियों का रस तथा बालवच, कूठ, शंखपुष्पी का मिश्रण बनाकर गाय के पुराने घी के साथ सेवन करने से पागलपन का रोग दूर हो जाता है.”

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