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दवा कम्पनी, डॉक्टर तथा केमिस्ट की लुट का खेल

दवा कम्पनी, डॉक्टर तथा केमिस्ट की लुट का खेल- जिस प्रकार कोढ़ की बामारी शरीर में लगने के बाद उससे छुटकारा नहीं मिलता है. ठीक वैसे ही दवा के क्षेत्र में भी कोढ़ लग चुका है. जी हाँ ये सच है आप को शायद यकीन नहीं होगा दवा कम्पनी (Drug Company), डॉक्टर और केमिस्ट तीनों मिल कर हजारों लाख करोड़ रुपये की लूट कर रहे हैं. इस समय भारत का स्वास्थ सिस्टम लगभग पूरी तरह ख़त्म हो चुका है. सच तो ये है लूटा जाने वाला ज्यादातर पैसा गरीबों का होता है. ऐसा नहीं है कि सभी डॉक्टर बेईमान होते हैं. कुछ सही भी होते हैं.

डॉक्टर और दवा को गरीबों का भगवान बोला जाता है. डॉक्टर बीमारियों की पहचान करते हैं तो दूसरी और दवाएं बीमारियों को ख़त्म करती हैं. होना तो यह चाहिए कि  दवा कंपनियां (Drug Company), डॉक्टर और केमिस्ट समाज के लिए काम करें. इंसानों की जान बचाने वाली दवाओं में कोई भ्रस्टाचार ना हो. परन्तु यहाँ सब उल्टा है. दवा कंपनियां, डॉक्टर और केमिस्ट केवल पैसे कमाने के लिए काम करते हैं. तो इंसानों की जिन्दगी तो खराब होती ही है. पूरा सिस्टम ही खराब हो जाता है. इस सिस्टम को फिर से सुधारने की कोई सम्भावना नजर नहीं आती है.

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लुट का खेल

देखा जाए तो स्वास्थ्य और दवा पर हर आदमी सबसे अधिक पैसा खर्च करता है. आपको जानकार हैरानी होगी कि लोग लाखों रुपये का बैंक बैलेंस यही सोचकर रखते हैं कि क्या पता परिवार में कोई कब बीमार हो जाए. पैसा काम आ जाए. यही नहीं बुढापे के लिए भी लोग यही सोचकर पैसा बचाते हैं कि चार पैसे जमा रहेंगें तो इलाज में काम आयेंगे. लेकिन दुःख की बात यह है कि भारत में दवाएं अपने दाम से अधिक मिलती हैं और दवाओं से मिलने वाला कमीशन वो लोग खा जाते हैं. जिन्हें हम भगवान कहते हैं.

जिस दिन हमारे देश के लाखों डॉक्टर, दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव से कह देंगे कि भैया हमें आपसे एक भी पैसा कमीशन नहीं चाहिएउसी दिन से दवाओं के दाम आधे से भी अधिक कम हो जाएंगे. लेकिन ये दिन शायद ही कभी आएगा.

आप अगर ध्यान दें तो सभी डॉक्टर दिन में एक घंटे मरीजों का इलाज बीच में छोड़कर मेडिकल रिप्रजेंटेटिव से मिलते हैं. इस दौरान मेडिकल रिप्रजेंटेटिव डॉक्टरों को यह लालच लेते हैं कि अगर आप हमारी कंपनी की इस दवा को मरीजों के लिए लिखें तो हम आपको 10.40 फ़ीसदी कमीशन देंगे. यह भी लालच दिया जाता है कि कमीशन तो हम देंगे ही तथा इसके अलावा हर साल कोई बड़ा गिफ्ट जैसे टीवी, वाशिंग मशीन,लैपटॉप आदि भी देंगे. इतनी बड़ी लालच मिलने पर डॉक्टर का ईमान डगमगा जाता है और वह अपने मरीजों को वही दवा लिखता है. जो दवा कंपनियों के मेडिकल रिप्रजेंटेटिव उन्हें कहते हैं.

अब शुरू होता है एक खेल दवा कंपनी दवाओं के दाम में डॉक्टर का कमीशन और मेडिकल रिप्रजेंटेटिव को दी जाने वाली सैलरी भी जोड़ लेती है और सभी दवाएं मेडिकल स्टोर पर रखवा दी जाती हैं. अब डॉक्टर मरीज की पर्ची में रिप्रजेंटेटिव की सजेस्ट की दवा लिखता है तथा मरीज को उसी मेडिकल स्टोर से दवा लेने को कहता है. मरीज को वही दवा मिलती है जिसमे डॉक्टर को कमीशन मिलना तय होता है. इस तरह से मरीज को जो दवाएं 10 रुपये में मिलनी चाहियें वही दवाएं 100 रुपये में मिलती हैं.  देखते ही देखते मरीज लूट लिया जाता है.

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आइये जाने दिन दिहाड़े कैसे होती है ये लूट

दरअसल हमारे देश में दवा कंपनियों (Drug Companies) ने बहुत बड़ा मकड जाल फैला रखा है. प्राइवेट फार्मास्यूटिकल्स (Pharmaceuticals) दो तरह की दवाएं बनाती हैं. एक है जेनेरिक और एक एथिकल यानी ब्रांडेड. जबकि दोनों दवाएं एक ही होती हैं. उनका एक ही कम्पोजीशन होता है. शरीर में एक ही असर करती हैं. बस दोनों में सिर्फ यही अंतर होता है कि जेनेरिक दवाओं की मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर पैसा नहीं खर्च किया जाता है. ऐसी दवाओं पर दवा कंपनियां लूट नहीं मचातीं और लागत के बाद थोडा सा फायदा लेकर उन्हें बाजार में उतार देती हैं. ऐसी दवाओं के दाम भी बढ़ाकर नहीं लिखे जाते और ज्यादातर सरकारी अस्पताल और ईएसआई अस्पतालों में यही दवाएं आती हैं.

लेकिन ब्रांडेड दवाओं पर दवा कंपनियां जमकर पैसा खर्च करती हैं और उनकी मार्केटिंग की जाती है दवा कम्पनियाँ अपने मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (MR) को डॉक्टरों के पास भेजती हैं. डॉक्टरों को ब्रांडेड दवाओं को ही मरीजों को ज्यादा से ज्यादा लिखने को बोला जाता है. बदले में 10 से 40 फ़ीसदी कमीशन और मोटे मोटे गिफ्ट दिए जाते हैं. अब इसका नतीजा यह होता है कि डॉक्टर मरीजों को वही दवा लिखते हैं. बदले में मोटा कमीशन कमाते हैं. इन्हीं सबके चलते दवाओं के दाम कई गुना बढ़ जाते हैं और देश में करोड़ों लोग दिन दहाड़े लूट लिए जाते हैं.

आप भी समझें ये घिनौना लुट का खेल

दवा कंपनी ने जेनेरिक और ब्रांडेड दो तरह की दवा बनाई है जेनेरिक और ब्रांडेड दोनों दवाओं में लागत आई है 10 रुपये. अब दवा कंपनी जेनेरिक दवा के 10 रुपये के पैकेट पर 2 रुपये मुनाफा कमाकर दवा बाजार में उतार देती है. अब इन दवाओं के दाम भी 12 रुपये की लिखे रहेंगे तो मरीजों को भी 12 रुपये में ही यह दवा मिलेगी और अब सरकारी अस्पतालों में यही दवाएं मिलती हैं. लेकिन प्राइवेट अस्पताल और प्राइवेट डॉक्टर ये दवाएं नहीं लिखते क्यूंकि उन्हें इन दवाओं पर कमीशन नहीं मिलता है .

अब ब्रांडेड दवा पर दवा कंपनियां मार्केटिंग और ब्रांडिंग पर मोटा खर्चा करती हैं और सरकार को उससे भी मोटा खर्चा दिखाकर दवा के दाम 12 रुपये की जगह 100 रुपये लिखे जाते हैं. मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (MR) डॉक्टर के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं कि आप इस दवा को अपने मरीजों को लिखो हम आपको हर 10 टेबलेट पर 40 रुपये का कमीशन देंगे और दिवाली गिफ्ट भी देंगे. ध्यान दीजिये अगर दवा कंपनी हर 10 टेबलेट पर डॉक्टर को 40 रुपये भी देती है तो उसका लागत तो 10 रुपये ही था. जेनेरिक दवा पर उसे केवल 2 रुपये मिल रहे थे लेकिन ब्रांडेड दवा पर उसे पचास रुपये मिल रहे हैं.

इसीलिए दवा कंपनियों ने हमारे देश में लूट का मकडजाल फैला रखा है.  दो रुपये मुनाफा कमाने का बजाय 50 रूपया मुनाफा कमा रहे हैं. दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश के लोगों को जो दवाएं 12 रुपये में मिलनी चाहिये वही 100 रुपये में मिलती है. सबसे अधिक गरीब मरीज ही लुटते हैं. बेचारा मरीज इस मकडजाल के खेल से अनजान है और अंदर से एक डर भी है क्युकि मरीज के नाम पर उसका इलाज जो करवाना है.

क्या लूट से बचने का कोई रास्ता भी है

इस लूट से बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है कि आप दवा खरीदने के बाद केमिस्ट से पक्का बिल लें और उसे जेनेरिक दवा देने के लिए कहें और अगर जेनेरिक दवा ना भी मिले तो इन्टरनेट पर दवा का रेट पता करें और देखें कि डॉक्टर और केमिस्ट आपसे कितना पैसा लूट रहे हैं.

इस मामले में सरकार ने अभी तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया है. हालाँकि ऑनलाइन दवा बिकने और इन्टरनेट की वजह से लूट में कुछ कमी आई है. लेकिन अभी भी बहुत लूट मची है. सरकार को ऐसा प्लेटफार्म उपलब्ध करना चाहिए ताकि मरीज को तुरंत ही दवा के असली दाम की जानकारी हो सके और लूटखोरों पर केस दर्ज करा सके.

सरकार ने एक हिंदी वेबसाइट राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) लांच की है. लेकिन इसमें केवल 1 फ़ीसदी दवाओं की ही जानकारी दी गयी है.कई महीनों से वेबसाइट अपडेट ही नहीं हुई है. अगर सरकार सभी दवाओं के दाम की जानकारी उपलब्ध करा दे तो शायद करोड़ों मरीज लुटने से बच जाएंगे. कमीशन खोर डॉक्टरों की पहचान हो सकेगी.

सरकारी निर्धारित मूल्य सूची यहाँ देखे

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